रायगढ़ (सृजन न्यूज)। हिंदी दिवस पखवाड़ा अंतर्गत 24 सितम्बर को केएमटी शासकीय गर्ल्स कॉलेज रायगढ़ में “हिंदी, चुनौतियाँ एवं संभावनाएं” विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। आमंत्रित साहित्यकार द्वय रमेश शर्मा, बसंत राघव के आतिथ्य और महाविद्यालय की प्राचार्या डॉ. उमा नेगी की अध्यक्षता में कार्यक्रम की शुरुआत हुई। महाविद्यालय के हिंदी प्राध्यापक राजकुमार राठौर ने हिंदी की वर्तमान स्थिति, उसकी चुनौतियों एवं संभावनाओं पर विषय प्रवेश करवाते हुए अपना प्रारंभिक वक्तव्य प्रस्तुत किया।
प्राचार्य डॉक्टर उमा नेगी ने अपना आशीर्वाद वक्तव्य देते हुए सभा को सम्बोधित कर बच्चों एवं अतिथियों का उत्साह बढ़ाया। कार्यक्रम में आमंत्रित मुख्य वक्ता हिंदी के सुपरिचित कहानीकार रमेश शर्मा ने हिंदी को लेकर चली आ रही धारणाओं की पड़ताल करते हुए यह कहा कि दुनिया की लगभग 800 करोड़ आबादी में 61 करोड़ लोग हिंदी भाषा बोलते हैं। अंग्रेजी 152 करोड़ और मंदारिन 118 करोड़ लोगों के बाद हिंदी तीसरे नंबर की भाषा है जो प्रमुख रूप से उपयोग में आती है। भारत में मातृभाषा हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या 43 करोड़ से ऊपर है। इसके बाद भी इस पर संकट की बात करना लाज़िमी नहीं है। 19वीं सदी के मध्य में जब अंग्रेज एग्रीमेंट के तौर पर मजदूरों को मॉरीशस, सूरीनाम, फिजी, त्रिनिडाड साउथ अफ्रीका जैसे देशों में भेजते थे तो वे अपने साथ जहाज में रामचरित मानस लेकर जाते थे। इन मजदूरों को गिरमिटिया कहा जाता था जो दिन भर काम कर शाम को थककर जब चौपाल में बैठते थे तो रामचरित मानस और हनुमान चालीसा का पाठ करते थे। वही उनके मानसिक मनोरंजन का साधन होता था। रामायण अवधि भाषा में होते हुए भी देवनागरी लिपि में है और उसे हिंदी का ही महाग्रंथ माना जाता है। इन गिरमिटिया मजदूरों में बहुत से लोग लेखक के रूप में सामने आए जिन्होंने उपन्यास लिखे और उस समय की लोक संस्कृति एवं सामाजिक जीवन का आख्यान रचा। विदेशों में हिंदी के विस्तार की यह जीवंत कहानी है। संस्कृति में बदलाव के साथ हिंदी भाषा की प्रकृति में भी आज एक बदलाव नज़र आता है।
आज हिंदी की दुनिया भी दो भागों में बंटी हुई है- एक हिंदी जिसे शुद्धतावादी नजरिए से बांधकर साहित्य तक सीमित करते हुए संकुचित कर दिया गया है। दूसरी हिंदी जिसे नई वाली हिंदी कहा जाता है उसका सम्बन्ध पॉप कल्चर से है।
हिंदी से जुड़ी चुनौतियाँ भी अनेक हैं। भाषा को केरियर से जोड़ देने का नज़रिया एक ऐसी चुनौती है जहां अंग्रेजी के पीछे भागने की प्रवृत्ति बढ़ी है। बचपन से ही बच्चे अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों में जाकर अपनी मातृभाषा से दूर हो रहे हैं। हिंदी भाषा को सिर्फ साहित्य तक सीमित कर दिया गया है। गांधी जी ने कहा था कि प्रायमरी कक्षाओं में बच्चों को अपनी मातृभाषा में ही शिक्षा मिलनी चाहिए। उसके बाद अंग्रेजी भाषा उसे सिखाया जाना चाहिए। हिंदी भाषी राज्यों में दुर्भाग्य से ऐसा हो नहीं रहा जो एक कठिन चुनौती है।
भारतीय भाषाओं के मध्य आपसी खींचातानी हिंदी की राह में एक दूसरी बड़ी चुनौती बनकर उभरी है। ग़ैरहिन्दी भाषी राज्य आज भी हिंदी भाषा का विरोध करते हैं जो कि एक और दूसरी बड़ी चुनौती है। पॉप कल्चर के माध्यम से मीडिया एवं सोशल मीडिया में विकसित हुई हिंदी कहीं-कहीं दूषित हुई है। ओटीटी प्लेटफार्म पर हिंदी गाली गलौज की भाषा बनी है तो टीवी डिबेट में युद्ध की भाषा बनकर उभरी है। इस पॉप कल्चर की हिंदी से समन्वय बनाकर हिंदी की जड़ों को बचाने की चुनौती आज सबके सामने है। हिंदी का किसी भाषा से विरोध नहीं है पर बाज़ार की भाषा बनने की दिशा में उसके मूल स्वभाव में जो परिवर्तन हो रहा है वह चिंता पैदा करता है। इन हो रहे बदलाव में समन्वय के साथ साथ उसके सामने अपने मूल स्वभाव को बचाने की चुनौती भी है। तकनीक से समन्वय स्थापित करते हुए वह बाज़ार की भाषा किस तरह बने, यह भी हिंदी के निश्चय ही बड़ी चुनौती है।
हिंदी भाषा की संभावनाओं पर चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि डिजिटल प्लेटफार्म इंस्टाग्राम, फेसबुक, यूट्यूब, ओटीटी इत्यादि जगहों में हिंदी भाषा के लिए अपार संभावनाएं पैदा हुई हैं। युवा इसे करियर के रूप में अपना रहे हैं। हिंदी संपर्क की भाषा बन रही है।उसका सामाजिक आधार मजबूत है। मेडिकल, इंजीनियरिंग की शिक्षा में हिंदी भाषा का प्रयोग मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्यों में प्रारम्भ हुआ है। एआई जैसे नए तकनीक में हिंदी के उपयोग की संभावनाएं बढ़ी हैं। कार्यक्रम में आमंत्रित कवि कहानीकार बसन्त राघव ने बच्चों के सम्मुख अपनी कविता का पाठ करते हुए इस अच्छे आयोजन के लिए महाविद्यालय परिवार को बधाई दी। कार्यक्रम में विद्यार्थियों एवं महाविद्यालय के प्राध्यापकों की उपस्थिति रही।महाविद्यालय की सहायक प्राध्यापक नीति देवांगन के धन्यवाद ज्ञापन के साथ इस गोष्ठी का समापन हुआ।








