वित्तमंत्री ओपी चौधरी से भी आवेदक प्रश्नात्मक निवेदन करेगा
रायगढ़ (सृजन न्यूज)। छत्तीसगढ़ सरकार जहां एक ओर सुशासन, पारदर्शिता और समयबद्ध सेवा वितरण को प्रतिबद्ध है, वहीं रायगढ़ तहसील कार्यालय की कार्यप्रणाली छत्तीसगढ़ सरकार के दूरदर्शी प्रतिबद्धता पर पलीता लगाने का कार्य कर रही है। एक साधारण नकल आवेदन के मामले में लगभग डेढ़ माह बीत जाने के बाद भी आवेदक को अभिलेखों की प्रमाणित प्रति उपलब्ध नहीं कराई जा सकी हैं, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था की कार्यकुशलता और जवाबदेही पर सवाल उठने लगे हैं।
एक आवेदक द्वारा दी गयी जानकारी यह बताता है कि सूचना के अधिकार अधिनियम, 2005 के अंतर्गत चाही गई जानकारी के संबंध में शिव कुमार डनसेना तहसीलदार एवं जनसूचना अधिकारी रायगढ़ द्वारा आवेदक को लिखित रूप से बताया गया कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता, 1959 की धारा 256 के तहत राजस्व अभिलेखों की प्रतिलिपि विधिवत नकल आवेदन कर प्रदाय किया जाना प्रावधानित है। शिव कुमार डनसेना तहसीलदार एवं जनसूचना अधिकारी रायगढ़ के लिखे गये उत्तर को यदि आधार माने, तो एक आवेदक ने 1 जुलाई 2026 को विधिवत नकल आवेदन प्रस्तुत किया गया तथा निर्धारित 100 रुपये शुल्क जमा कर रसीद प्राप्त की।
नकल शाखा द्वारा जारी रसीद में स्पष्ट रूप से उल्लेख किया गया कि आवेदक को संबंधित दस्तावेजों की नकल 9 जुलाई 2026 को उपलब्ध करा दी जाएगी। किंतु निर्धारित तिथि गुजरने के बाद भी आवेदक को कोई अभिलेख प्राप्त नहीं हुआ। इसके बाद आवेदक ने कई बार तहसील कार्यालय, नकल शाखा तथा संबंधित बाबुओं से संपर्क किया, लेकिन हर बार उसे एक ही उत्तर मिला कि फाइल नहीं मिली है। सबसे गंभीर बात यह है कि जिस दस्तावेज को प्राप्त करने के लिए स्वयं तहसीलदार ने वैधानिक प्रक्रिया अपनाने का लिखीत मार्ग बताया है। उसके पश्चात् भी कोई दस्तावेज की प्रति विभाग लगभग डेढ़ माह बाद भी उपलब्ध नहीं करा सक रहा है। यदि किसी सरकारी कार्यालय में केस दर्ज किया गया हो और उसका अभिलेख ही उपलब्ध न हो अथवा उनका पता नहीं चल पा रहा है, तो यह न केवल प्रशासनिक लापरवाही का मामला है बल्कि तहसील कार्यालय द्वारा किया गया यह कृत्य अभिलेख प्रबंधन व्यवस्था की भी पोल खोलता है।
इसके अतिरिक्त न्याय और प्रशासनिक पारदर्शिता की उम्मीद में आवेदक ने 10 अगस्त को कलेक्टर रायगढ़ को लिखित शिकायत प्रस्तुत की। शिकायत के बावजूद 22 अगस्त 2026 तक संबंधित नकल आवेदक को प्राप्त नहीं हो सका है। इससे यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब उच्च अधिकारियों तक शिकायत पहुंचने के बाद भी समस्या का समाधान नहीं हो रहा है, तब आम नागरिकों को न्याय और समयबद्ध सेवाएं कैसे प्राप्त होंगी ? विशेषज्ञों का मानना है कि छत्तीसगढ़ भू-राजस्व संहिता की धारा 256 के तहत मांगी गई नकल को अनावश्यक रूप से लंबित रखना नागरिकों के वैधानिक अधिकारों का हनन है। वहीं सूचना के अधिकार अधिनियम की भावना भी यही है कि प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए। परंतु रायगढ़ तहसील का यह मामला दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी व्यवस्था में सुधार की बड़ी आवश्यकता है।
अब सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या सुशासन का अर्थ केवल घोषणाओं और प्रचार तक सीमित रह जाएगा या फिर ऐसे मामलों में जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही भी तय की जाएगी ? रायगढ़ तहसील का यह प्रकरण प्रशासनिक उदासीनता का ऐसा उदाहरण बन गया है, जिसने सरकार के सुशासन संबंधी दावों को कठघरे में खड़ा कर रहा है। ज्ञात हो कि रायगढ़ विधानसभा के लोगों को संबोधित करते हुए रायगढ़ विधायक एवं प्रदेश के वित्तमंत्री ओ.पी. चौधरी ने जिस दिन विशाल मत से जीत प्राप्त की, उसी दिन मीडिया के माध्यम से उन्होंने कहा था कि जिसने भी अपने हाथ के उंगलियों में स्याही लगया है, वह मुझसे प्रश्न पूछ सकता है। आवेदक भी रायगढ़ विधानसभा का एक सामान्य नागरिक है।








