
रायगढ़ (सृजन न्यूज)। किसी भी व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके संघर्ष, कर्म और समाज के प्रति समर्पण से बनती है। रायगढ़ की पुरानी बस्ती की गलियों में बीता बचपन आज एक ऐसी पहचान में बदल चुका है, जिसे शहर का हर वर्ग सम्मान की दृष्टि से देखता है। यह कहानी है समाजसेवी, शिक्षाविद, पत्रकार और खेल प्रेमी रामचंद्र शर्मा की, जिनका जन्म एक साधारण ब्राह्मण परिवार में स्व. मनीराम शर्मा एवं स्व. पूर्णिमा देवी के पुत्र के रूप में हुआ।
रामचंद्र शर्मा का बचपन रायगढ़ की पुरानी बस्ती में बीता। सीमित संसाधनों वाले परिवार में पले-बढ़े रामचंद्र शर्मा ने कभी परिस्थितियों को अपनी मंजिल के बीच दीवार नहीं बनने दिया। बचपन से ही उन्होंने अनुशासन, मेहनत और आत्मविश्वास को अपना सबसे बड़ा साथी बनाया। यही कारण है कि आज वे समाज के विभिन्न क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान स्थापित कर चुके हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा भूपदेव प्राथमिक शाला, केवड़ाबाड़ी में हुई। इसके बाद उन्होंने छठवीं से बारहवीं तक की पढ़ाई रायगढ़ के नटवर स्कूल में पूरी की तथा स्नातक की शिक्षा रायगढ़ के शासकीय डिग्री कॉलेज से प्राप्त की। छात्र जीवन में वे पढ़ाई के साथ-साथ एनसीसी, खेलकूद और सामाजिक गतिविधियों में भी हमेशा अग्रणी रहे। विद्यालय और महाविद्यालय के दिनों से ही उनमें नेतृत्व क्षमता साफ दिखाई देती थी।
पुरानी बस्ती के लोग आज भी याद करते हैं कि रामचंद्र शर्मा का अधिकांश समय मोहल्ले के युवाओं के साथ खेल, सामाजिक गतिविधियों और जनहित के कार्यों में बीतता था। वे चांदनी चौक क्रिकेट टीम के कप्तान रहे और स्थानीय दुर्गा उत्सव समितियों सहित अनेक सामाजिक आयोजनों में सक्रिय भूमिका निभाते रहे। बचपन में ही उन्होंने लोगों को साथ लेकर चलने और टीम भावना से कार्य करने का गुण विकसित कर शिक्षा के क्षेत्र में भी उनका योगदान उल्लेखनीय माना जाता है। संस्कार पब्लिक स्कूल के डायरेक्टर के रूप में वे बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बेहतर संस्कार देने के उद्देश्य से कार्य कर रहे हैं। वहीं खेल जगत में जिला क्रिकेट संघ के सचिव के रूप में युवा खिलाडय़िों को अवसर उपलब्ध कराने और जिले में क्रिकेट गतिविधियों को मजबूत करने का निरंतर प्रयास कर रहे हैं। वे विप्र फाउंडेशन की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य के रूप में भी अपनी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं।

रामचंद्र शर्मा को जानने वाले बताते हैं कि सफलता मिलने के बाद भी उन्होंने अपनी सादगी, सहजता और लोगों से जुड़े रहने की आदत नहीं छोड़ी। पुरानी बस्ती से निकला यह बेटा आज भी आम लोगों की समस्याओं को सुनने और उनके समाधान के लिए आगे आने में विश्वास रखता है। यही कारण है कि समाज के विभिन्न वर्गों में उनके प्रति विश्वास लगातार बढ़ा है। 25 जुलाई को उनके जन्मदिवस के अवसर पर यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि पुरानी बस्ती की गलियों से शुरू हुई यह यात्रा आज रायगढ़ की पहचान का हिस्सा बन चुकी है। संघर्ष, सेवा और समर्पण का यह सफर इस बात का प्रमाण है कि मजबूत इरादे और निरंतर मेहनत से साधारण परिस्थितियों में जन्म लेने वाला व्यक्ति भी समाज में असाधारण पहचान बना सकता है।







