गुंडिचा मौसी के घर से मंदिर वापस लौटे महाप्रभु

by SUNIL NAMDEO
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बाहुड़ा रथयात्रा पर पुरानी बस्ती में दिखा भक्ति और श्रद्धा का अनुपम संगम, त्रिदेव का आज होगा अद्वितीय सोनाभेष दर्शन

रायगढ़ (सृजन न्यूज)। रियासतकालीन श्री जगन्नाथ मंदिर रायगढ़ की पुरानी गौरवशाली परंपरा के अनुरूप आषाढ़ शुक्ल दशमी के पावन अवसर पर आज भगवान श्रीजगन्नाथ, बड़े भाई श्रीबलभद्र एवं बहन देवी सुभद्रा की बाहुड़ा (वापसी) रथयात्रा श्रद्धा, आस्था और वैदिक रीति-रिवाजों के साथ निकली। 8 दिनों तक मौसीघर (गुंडिचा मंदिर) में प्रवास के पश्चात महाप्रभु पुनः अपने श्रीमंदिर लौटे।

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                       सनातन परंपरा में बाहुड़ा यात्रा केवल भगवान की वापसी नहीं, बल्कि सृष्टि-चक्र की पूर्णता, धर्म की पुनर्स्थापना तथा जीवात्मा के परमात्मा से पुनर्मिलन का दिव्य प्रतीक मानी जाती है। शास्त्रों में भगवान जगन्नाथ को समस्त चराचर जगत का नाथ व कलियुग के सर्वसुलभ आराध्य के रूप में वर्णित किया गया है। उनकी रथयात्रा सामाजिक समरसता, सेवा, समानता और विश्वबंधुत्व का ऐसा संदेश देती है, जहाँ जाति, वर्ग, भाषा और क्षेत्र के सभी भेद स्वतः समाप्त हो जाते हैं और प्रत्येक श्रद्धालु को महाप्रभु का रथ खींचने का समान सौभाग्य प्राप्त होता है।
शुक्रवार शाम महाप्रभु श्री जगन्नाथ, श्री बलभद्र एवं माता सुभद्रा रथारूढ़ होकर गुंडिचा मौसी घर से श्रीमंदिर के लिए प्रस्थान किया। भव्य वापसी यात्रा गांजाचौक, हटरी चौक, गद्दी चौक, पैलेस रोड होते हुए मोतीमहल स्थित श्री जगन्नाथ मंदिर पहुंची। मार्ग में विभिन्न स्थानों पर भजन-कीर्तन, पुष्पवर्षा एवं महाआरती के साथ श्रद्धालुओं ने महाप्रभु का स्वागत किया। पैलेस रोड में पंडित ब्रजेश्वर मिश्र, श्री गोपीनाथ जीव मंदिर तथा श्री जगन्नाथ मंदिर के समक्ष उत्कल सांस्कृतिक सेवा समिति की सांस्कृतिक इकाई “उत्कलिका” द्वारा विशेष महाआरती एवं स्वागत समारोह हुआ।

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आज होगा राजकीय स्वरूप में दुर्लभ ‘सोनाभेष’ दर्शन

आषाढ़ शुक्ल एकादशी यानी 25 जुलाई को सायं 7 बजे महाप्रभु का अत्यंत आकर्षक एवं दुर्लभ ‘सोनाभेष’ (स्वर्णवेष) सम्पन्न होगा। इस अवसर पर भगवान श्री जगन्नाथ स्वर्ण मुकुट, स्वर्ण आभूषणों एवं दिव्य आयुधों से अलंकृत पूर्ण राजकीय स्वरूप में भक्तों को दर्शन देंगे। पुरी श्रीमंदिर की परंपरा के अनुरूप आयोजित होने वाला यह अलौकिक आयोजन छत्तीसगढ़ में केवल रायगढ़ के रियासतकालीन श्री जगन्नाथ मंदिर में ही सम्पन्न होता है, जो इसकी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान है। इस दिन महाप्रभु एवं माता महालक्ष्मी को विशेष रूप से रसगुल्ले का भोग अर्पित किया जाता है। हरिशयनी एकादशी से भगवान श्रीहरि चार माह की योगनिद्रा में प्रवेश करते हैं। इसी के साथ चातुर्मास प्रारंभ होता है, जिसके दौरान विवाह, गृहप्रवेश, सगाई, यज्ञोपवीत, शिलान्यास सहित अधिकांश वैदिक मांगलिक संस्कार परंपरानुसार स्थगित रहते हैं और देवउठनी एकादशी के पश्चात पुनः प्रारंभ होते हैं।

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