जीव जब भक्ति के तट पर जाता है तब उसे होती है भगवत् प्राप्ति : आचार्य मृदुल कृष्ण

by SUNIL NAMDEO
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खरसिया में बहु झोलरी वाले गर्ग परिवार के यहां आयोजित श्रीमद भागवत कथा में भक्त समझ रहे धर्म का मर्म

खरसिया/रायगढ़ (सृजन न्यूज)। बहु झोलरी वाले गर्ग परिवार के तत्वावधान में अजीत सिंह नगर खरसिया में आयोजित श्रीमद्भागवत कथा के षष्ठम दिवस की कथा में आचार्य मृदुल कृष्ण गोस्वामी ने श्रीमद्भागवत कथा में नंद बाबा को वरुण देवता द्वारा अपने लोक में ले जाने और भगवान के द्वारा उनको वापस लाकर वरुण देवता पर कृपा करने की कथा और भगवान की रास लीला का वर्णन किया। आचार्य श्री ने रासलीला का अद्भुत रहस्य बताते हुए कहा कि रासलीला काम-लीला नहीं है बल्कि ये कामदेव पर विजय की लीला है।

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                गोपी या सखी के स्वरूप पर विस्तार से चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि गोपी या सखी एक भाव होता है। जब तक जीव भक्ति के तट पर नहीं जाता है उसे भगवत् प्राप्ति नहीं होती है। गोपी गीत के महत्व को बताते हुए आचार्य ने कहा कि गोपी गीत का पाठ करने वाले को भगवान की कृपा और दर्शन अवश्य मिलते हैं। भगवान का एहसास ही रास है। भगवान शंकर भी पवित्र महारास लीला का दर्शन करने के लिए गोपी वेष में कैलाश से आये थे। उन्होंने कहा कि भगवान की महारास लीला इतनी दिव्य है कि स्वयं भोलेनाथ उनके बाल रूप के दर्शन करने के लिए गोकुल पहुंच गए। मथुरा गमन प्रसंग में अक्रूर भगवान को लेने आए।

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     उन्होंने आगे बताया कि जब भगवान श्रीकृष्ण मथुरा जाने लगे समस्त ब्रज की गोपियां भगवान कृष्ण के रथ के आगे खड़ी हो गईं। कहने लगी हे कन्हैया जब आपको हमें छोड़कर ही जाना था तो हम से प्रेम क्यों किया। महारास देखते-देखते ब्रह्मा सोचने लगे कि कृष्ण और गोपियां निष्काम तो हैं, फिर भी देह का भान भूलकर इस प्रकार क्रीड़ा करने से क्या व्यवस्था, शास्त्र और मर्यादा का उल्लंघन नहीं होगा? वे यह नहीं समझ सके कि प्रेम का रास, विलास नहीं, धर्म का फल है, यानी प्रेम का फल है। कृष्ण ने अचानक सभी सोलह हजार गोपियों को अपना स्वरूप दे दिया और सर्वत्र कृष्ण ही कृष्ण दिखाई देने लगे। गोपियां हैं कहां ? महारास प्रेम का अद्वैत स्वरूप है, जिसमें भगवत् स्वरूप हो जाने के बाद जीव का स्वत्व नहीं रहता है।

      कंस उद्धार, उद्धव गोपी संवाद, द्वारिका गमन व भगवान के विवाहों की और रुक्मिणी मंगल की भाव विभोर करने वाली कथा में आचार्य ने कहा कि रुक्मणि साक्षात् लक्ष्मी स्वरूपा हैं । वे भगवान को छोड़कर भला शिशुपाल का वरण कैसे कर सकतीं हैं। नख पै गिरवर लीन्हों धार कन्हैया मेरो बारो, दूर नगरी बड़ी दूर नगरी कैसे मैं आऊं मैं कन्हाई तोरी गोकुल नगरी, ये तो प्रेम की बात है ऊधौ बंदगी तेरे बस की नहीं है, वंशी बजाय गयो श्याम मोसे नैना मिलाया के, तेरी वंशी पे जाऊं बलिहार रसिया, आदि सुंदर भजनों पर श्रोतागण भाव विभोर होकर नृत्य कर रहे थे।

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