सरस्वती शिशु मंदिर में शिशुओं के चहुंमुखी विकास के लिए हुआ मातृशक्ति सम्मेलन
रायगढ़ (सृजन न्यूज़)। स्थानीय राजीव नगर स्थित सरस्वती शिशु मंदिर में मातृ सम्मेलन आयोजित की गई।
सर्वप्रथम भारतीय परम्परानुसार विद्या की अधिष्ठात्री देवी मां सरस्वती, ओम और भारत माता के समक्ष एलपी कटकवार (व्यवस्थापक), जगदेव प्रसाद पटेल (प्राचार्य) एवं श्यामलाल पटेल (वरिष्ठ आचार्य) के करकमलों द्वारा दीप प्रज्ज्वलित कर सम्मेलन का शुभारंभ सरस्वती वंदना रेवती मालाकार आचार्या ने किया। इस सम्मेलन के मंचासीन अभ्यागतों का परिचय संस्था प्रमुख ने कराया। विद्यालय के भैया समीर बरेठ ने तिलक, रोली, चंदन लगाकर स्वागत किया। आचार्या अन्नू चौहान की सुरीली मधुर आवाज में स्वागत गीत “मन की वीणा से गुंजित ध्वनि मंगलम् , स्वागतम-स्वागतम-स्वागतम्” प्रस्तुत किया गया। हारमोनियम पर स्वर भैया समीर ने दिया।
तत्पश्चात् आचार्य श्यामलाल पटेल ने मातृ सम्मेलन का उद्देश्य बताते हुए कहा कि शिशुओं के सर्वांगीण विकास में माताओं का विशेष महत्व है। मातृशक्ति सम्मेलन का मुख्य उद्देश्य शिशुओं का चहुंमुखी विकास करना और मां अपने बच्चों में लव, कुश, ध्रुव, प्रहलाद, सीता व सावित्री के आदर्शों और चारित्रिक संस्कारों को निर्मित कर शिशुओं को कुल का दीपक, राष्ट्र का गौरव और जग का दिवाकर बना सकते हैं।
वहीं माताओं बहनों के बीच भजन, रंगोली के साथ ही मनोरंजक और आनंददायक खेल का आनन्द लिया गया। शिशुओं के चहुंमुखी विकास में सहायक मातृशक्तिओं से बच्चों के स्वास्थ्य, शिक्षा और संस्कार को पुष्ट करने हेतु सुझाव आमंत्रित किया गया। इसमें माताओं-बहनों ने बच्चों के चहुंमुखी विकास को दृष्टिगत रखते हुए सार्थक सुझाव दिया। विद्यालय की शिक्षा – संस्कार, व्यवस्था – अनुशासन आदि गतिविधि से संतुष्टि व्यक्त की गई।
सम्मेलन में शामिल हुए मातृशक्ति को संबोधित करते हुए प्राचार्य ने कहा कि शिशु विद्या के मंदिर में 4-6 घंटे अपने आचार्यों के सानिध्य में रहते हैं। शेष 18 से 20 घंटे समाज और परिवार के बीच अपना समय व्यतीत करता है। अतः बच्चों के चहुंमुखी विकास में माताओं की भूमिका अहम होती है। मुख्य अतिथि एलपी कटकवार ने कहा कि विद्यालय में आचार्यों के द्वारा सिखाए गए विषय को बालक कितना ग्रहण कर लिया, कितना नहीं, इसका आकलन मां ही करती है क्योंकि मां शिशु का प्रथम गुरु होती हैं। बच्चों के निर्माण में मां का अहम भूमिका होती है। छोटी – छोटी क्रियाओं, गतिविधियों को नियमित कराते हुए इन बच्चों में योग्य संस्कार पनपाया जा सकता है। प्रतिदिन विद्यालय में भैया – बहनों के द्वारा प्रार्थना, भोजन के समय भोजन मंत्र किया जाता है। प्रार्थना में बड़ी शक्ति होती है जो दिखाई नहीं देती। बालकों के चहुंमुखी विकास के लिए पालक (अभिभावक), बालक और शिक्षक (आचार्य) तीनों को किसी भी एंगल से कमजोर नहीं पड़ना चाहिए। तीनों को सतर्क रहने की अति आवश्यकता है तभी हम अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकने में समर्थ होंगे।
इस अवसर पर विद्यालय के तीजा पटवा, कविता तिवारी, सुषमा होता, तृप्ति ओगले, ममता वंजारी, विजया लक्ष्मी पटेल, दीपिका साहू, उजाला साहू, योगिता राठौर, अंजू चंद्रा, फूलेश्वरी लहरे, मोना यादव ने अहम भूमिका निभाई। आचार्या रजनी थवाईत ने सम्मेलन में सम्पन्न हुए विषयों के सारांश पंजी में लेखन कार्य किया। आचार्या रेवती मालाकार ने कल्याण मंत्र कर कार्यक्रम का समापन किया।