Home रायगढ़ न्यूज कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984 की धारा 10 (3) का कैसे करें प्रयोग?

कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1984 की धारा 10 (3) का कैसे करें प्रयोग?

by SUNIL NAMDEO

रायगढ़ (सृजन न्यूज)। कल्पना करें कि विवाहित महिला ने धारा 125 भरण पोषण का मामला अदालत मे डाल दिया हैं जिसका एक मात्र आधार दहेज की मांग और मारपीट की धटना हैं जो पुलिस थाने में दर्ज करवाई गई हैं। पुलिस को शिकायत आवेदन दिया गया हैं महीने भर बाद पुलिस अपराध दर्ज करती है, लेकिन इसके पहले भरण पोषण का मुकदमा अदालत में पेश कर दिया जाता हैं।
       हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 09 का लक्ष्य दाम्पत्य संबंधो की पुनर्स्थापना है। पुरूष के पास धारा 09 की डिक्री हैं तो महिला भरण पोषण की हकदार नहीं हैं। अधिवक्ता आम तौर पर यह सुझाव पक्षकार को देता हैं कि सबसे पहले धारा 09 की डिक्री हासिल करें। एक परंपरागत दृष्टिकोण यह हैं कि पुरूष को सबसे पहले धारा 09 की डिक्री हासिल करना चाहिए, लेकिन महिला ने पहले ही अदालत में धारा 125 भरण पोषण की याचिका दाखिल कर दी हैं। विचारणीय प्रश्न यह है कि पुरूष के धार्मिक एवं वैधानिक अधिकार की बात कब होगी ?
     भरण पोषण कानून धारा 125 (4) कहती हैं कि यदि पर्याप्त कारण के बिना महिला पृथक निवास कर रहीं हैं तो वह भरण पोषण की हकदार नहीं हैं। साक्ष्य में पुलिस को दिया गया आवेदन पत्र जिसमें दहेज की शिकायत हैं। मारपीट, लड़ाई – झगड़ा का कोई सबूत नहीं हैं। महिला का एक सूत्रीय कार्यक्रम है कि मायके में रहूंगी और भरण पोषण हासिल करूंगी। दूसरे शब्दो में कानून की आड़ में धारा 384 भा0द0वि0 का अपराध महिलाएं कर रहे हैं जिसे कहते है जबरन् उगाही का धंधा। ऐसी महिलाओं से कैसे निपटा जा सकता हैं ? कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम 1986 की धारा 10 (3) का अर्थ केवल इतना हैं कि न्यायालय स्वयं की प्रक्रिया निर्धारित न्याय हित में कर सकती हैं।
              रायगढ़ में सीनियर एडवोकेट एसके घोष बताते हैं कि पुरूष पक्ष को इस विधान के तहत एक आवेदन पेश करना चाहिए और दामपत्य संबंधो की स्थापना की मांग करना चाहिए। भारण पोषण कानून में मुकदमा चल रहा हैं, अंतरिम भरण पोषण का जवाब के साथ कुटुम्ब न्यायालय अधिनियम की धारा 10 (3) के तहत आवेदन करना चाहिए और दाम्पतय संबंधो की स्थापना हेतु महिला को निर्देर्शित करने की याचना करना चाहिए। पुरूष के पक्ष में उनकी ओर से आवेदन में लिखें कि महिला को ससुराल में परेशानी हैं, दहेज की मांग की जाती हैं, मारपीट होती हैं जैसा कि भरण पोषण याचिका में लिखा गया हैं लेकिन मायके में यह संभव नहीं है। आज वैवाहिक जीवन आपसी तालमेल एवं सामंजस्य के अभाव में पटरी से उतर गया है। महिलाओं के पक्ष में कानून बनने से इसके दुरुपयोग से इंकार नहीं किया जा सकता है। हाल ही में लगातार ऐसे विकट लोमहर्षक अप्रत्याशित घटनाओं से हमें कैसे निपटना है, यही समय की मांग है।

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