
रायगढ़ (सृजन न्यूज)। भारत में मकान या फ्लैट किराए पर देने वाले मकान मालिकों के लिए आजकल लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट (Leave and License Agreement) सबसे सुरक्षित विकल्प बन चुका है। वर्तमान परिवेश में कानूनी सलाहकारों का मानना है कि यह पारंपरिक किराएदारी समझौते (Rent/Tenancy Agreement) से कहीं ज्यादा मालिक-हितैषी है। आखिर क्यों, इस बारे में वरिष्ठ अधिवक्ता एसके घोष विस्तार से बताते हैं।

लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट क्या है?
1.यह एक कानूनी दस्तावेज है जो इंडियन ईजमेंट एक्ट,(Indian Easement Act) 1882 की धारा 52 के तहत तैयार किया जाता है। इसमें मकान मालिक (लाइसेंसर) किराएदार (लाइसेंसी) को अपनी संपत्ति में रहने या इस्तेमाल करने की सिर्फ अस्थायी अनुमति देता है। यहां कोई स्वामित्व हस्तांतरण या टेनेंसी अधिकार नहीं बनते — इसमें मालिक का पूरा नियंत्रण और मालिकाना हक बरकरार रहता है। ज्यादातर मामलों में इसे 11 महीने के लिए बनाया जाता है, ताकि रजिस्ट्रेशन और ज्यादा स्टांप ड्यूटी से बचा जा सके।

2.मकान मालिकों को यह क्यों बनवाना चाहिए?
आज के समय में प्रॉपर्टी मालिकों की सबसे बड़ी चिंता होती है — किराएदार को निकालना। कई पुराने किराएदार सालों तक नहीं जाते, कोर्ट के चक्कर काटते हैं और प्रॉपर्टी “स्क्वाटर” बन जाती है। लाइव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट इस समस्या का सबसे मजबूत समाधान है। यह मालिक को लचीलापन, कानूनी सुरक्षा और तेज़ रिकवरी देता है।

3.किराएदारी एग्रीमेंट से क्यों बेहतर माना जाता है?
पारंपरिक किराएदारी समझौता ट्रांसफर ऑफ प्रॉपर्टी एक्ट और राज्य के रेंट कंट्रोल एक्ट के दायरे में आता है, जो किराएदार को बहुत सुरक्षा देता है। वहीं लाइव एंड लाइसेंस में ऐसा कुछ नहीं होता। यहां कुछ मुख्य कारण हैं:
4.- कोई टेनेंसी अधिकार नहीं बनते — किराएदार को संपत्ति में कोई “हित” या मालिकाना अधिकार नहीं मिलता। मालिक का नियंत्रण पूरा रहता है, और रेंट कंट्रोल कानून लागू नहीं होते। इससे किराया बढ़ाना या नियम बदलना आसान हो जाता है।
5.- मकान से निकालना बहुत आसान और तेज़ — अवधि समाप्त होते ही या नियम का उल्लंघन करने पर सिर्फ नोटिस (आमतौर पर 15 से 30 दिन) देकर संपत्ति वापस ली जा सकती है। कई राज्यों में समरी प्रक्रिया से 3-6 महीने में केस समाप्त हो जाता है, जबकि किराएदारी में कोर्ट केस 2-5 साल तक या और अधिक समय तक चल सकता है।
6.- मालिक का संपत्ति में प्रवेश और उपयोग का अधिकार — मालिक कभी भी मरम्मत, इंस्पेक्शन या दिखाने (विक्रय के लिए) उस मकान या दुकान में प्रवेश कर सकता है। किराएदार इसमें मना या आपत्ति नहीं कर सकता, क्योंकि यह अनुमति-आधारित है, न कि अनन्य कब्जा।
7.- ट्रांसफर या सब-लेट पर रोक — बिना लिखित अनुमति के किराएदार इसे किसी और को नहीं दे सकता। मृत्यु या प्रॉपर्टी बिकने पर भी यह एग्रीमेंट अपने आप खत्म हो जाता है।
8.- कम कानूनी झंझट और लागत — 11 महीने का होने से रजिस्ट्रेशन अनिवार्य नहीं (कई राज्यों में), स्टांप ड्यूटी कम लगती है। सब कुछ लिखित होने से विवाद कम होते हैं — डिपॉजिट, लेट फीस, मेंटेनेंस, यूटिलिटी सब क्लियर।
- 9.NRI मालिकों के लिए खास फायदेमंद — विदेश में रहते हुए भी आसानी से प्रॉपर्टी मैनेज और वापस ले सकते हैं, क्योंकि कब्जा अनन्य नहीं होता।
मकान मालिक अब लंबी अवधि की टेनेंसी से बच रहे हैं, क्योंकि आधुनिक जीवनशैली में लोग जॉब, शादी-विवाह या ट्रांसफर के कारण 2-4 साल ही रहते हैं। लीव एंड लाइसेंस उन्हें हर साल रिन्यू करने की सुविधा देता है, बिना पुराने किराएदारी के बोझ के। प्रदेश में छत्तीसगढ़ एकॉमोडेशन कंट्रोल एक्ट, लागू है, लेकिन लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट इसके दायरे से बाहर है। इससे मकान मालिकों को ज्यादा फायदा मिलता है। बड़े शहरों में अब ज्यादातर नए रेंटल एग्रीमेंट इसी फॉर्मेट में हो रहे हैं। संक्षेप में, अगर आप मकान मालिक हैं और अपनी प्रॉपर्टी सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो लीव एंड लाइसेंस एग्रीमेंट आज का सबसे स्मार्ट और मालिक-फ्रेंडली विकल्प है। किराएदारी समझौता किराएदार को ज्यादा बल प्रदान करता है, जबकि यह आपको पूरा कंट्रोल और शांति देता है।