पैसा उधार दिया, वापस नहीं मिल रहा है तो अब वसूली कैसे करें ?

by SUNIL NAMDEO
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कानून की प्रक्रिया से रकम वसूली के लिए क्या करना पड़ता है : अधिवक्ता एसके घोष

रायगढ़ (सृजन न्यूज़)। मित्रवत् ऋण (friendly loan) समय की जरूरत के अनुसार लेन- देन करना पड़ता है। पैसे का लेन-देन हो जाता हैं। एक निश्चित समय गुजरने के बाद भी दूसरा व्यक्ति रकम लौटा नहीं रहा हैं केवल लौटाने का आश्वासन देता रहता हैं, समय गुजरते चला जाता हैं। लेन- देन की कोई लिखा- पढ़ी नहीं हैं, नगद लेन देन है, तो अब रकम की वापसी कैसे होगी ?
         सीनियर एडवोकेट एसके घोष बताते हैं कि ऋण राशि का लेन देन बैंकिंग प्रणाली के माध्यम से किया जाना चाहिए, जो वसूली के लिए एक प्रमाण होता हैं। यदि आपके खाते में बैंकिंग चैनल के माध्यम से पैसा आया हैं तो बैंकिंग चैनल के माध्यम से लौटाना हैं। किसी अन्य व्यक्ति का पैसा अपने खाते में कभी भी नहीं मंगाना चाहिए, अन्यथा कभी भी वसूली की कार्यवाही का सामना करना पड़ सकता हैं। यह एक सावधानी एवं सर्तकता का नियम हैं। कुछ बेईमान ऋण लेते हैं और लौटाने की नीयत नहीं रखते हैं। उनका पहला प्रयास यही रहता हैं कि किसी तरह से 3 वर्ष गुजर जाए, इसके बाद कानून की प्रक्रिया के जरिए वसूली संभव नहीं हैं। कुछ बेईमान व्यक्ति ऋण लेते हैं तो किसी दूसरे के बैंक खाता में अंतरण करवा देते हैं। ऋण अदा करने से बच निकलते हैं क्योंकि पैसा अदा करने की जिम्मेदारी उस व्यक्ति की होती हैं जिसके खाते में पैसा गया हैं।
     ऋण राशि की वसूली के लिए लिखा- पढ़ी के साथ एक अनुबंध पत्र होना आवश्यक हैं, धनराशि का स्रोत होना आवश्यक है। ऋण विधिमान्य होना चाहिए। एक निश्चित धनरशि होना चाहिए। सिविल प्रक्रिया संहिता का आदेश 37 में ऋण राशि की वसूली बहुत जल्दी हो जाती हैं लेकिन राशि अविवादित होना चाहिए। ऋण की वसूली के लिए समय सीमा 03 वर्ष हैं। ऋण देने की दिनांक से 03 वर्ष के भीतर वसूली की प्रक्रिया को प्रारंभ किया जा सकता हैं। सबसे पहले अपने अधिवक्ता से संपर्क करें, पुलिस में शिकायत करें, मांग सूचना पत्र जारी करें और उधार दी गई रकम की मांग करे। मांग सूचना पत्र में ऋण राशि को अपने बैंक खाता में अंतरित करने को कहें। यदि 30 दिवस के अंदर रकम बैंक खाता में प्राप्त नहीं होती हैं, तो सिविल वाद न्यायालय में पेश कर दें। आदेश 37 सिविल प्रक्रिया संहिता 1906 में संक्षिप्त विचारण की प्रक्रिया को अपनाया जाता हैं। ऋण अनुबंध पत्र एवं बैंक स्टैटमैन्ट ठोस एवं विश्वसनीय सबूत हैं। धनराशि का अंतरण स्वयं सिद्ध हो रहा हैं।
                    न्यायालय वादी के वाद पत्र को देखने के बाद ऋणी व्यक्ति को उपस्थिति के लिए समंस भेजता हैं। ऋणी व्यक्ति /प्रतिवादी को अपना बचाव करना हैं तो उसके पास ठोस एवं विश्वसनीय साक्ष्य या आधार होना चाहिए। यदि न्यायालय संतुष्ट हैं कि प्रतिवादी के पास कोई बचाव उपलब्ध हैं, जो कि वास्तव में एक बचाव हैं तभी उसे अवसर दिया जाता हैं, अन्यथा नहीं दिया जाता हैं। आदेश 37 सिविल प्रक्रिया का सहारा तभी लिया जाता हैं जबकि दस्तावेजी साक्ष्य पर्याप्त हैं, किसी अन्य गवाहों को सुनने की कोई आवश्यकता नहीं हैं। न्यायालय वादी के पक्ष में फैसला सुना देती हैं। इसके बाद वसूली की कार्यवाही प्रारंभ हो जाती हैं।
                   न्यायालय में आदेश 37 सिविल प्रक्रिया संहिता का मामला पेश कर दिया गया हैं, प्रतिवादी उपस्थित होकर आंशिक भुगतान किया जाना बताता हैं तो विवादित रकम आशिंक भुगतान की गई रकम है जो कि बैंक खाता से बैंक खाता में प्राप्त की गई थी लेकिन बंैकिंग चैनल के माध्यम से अदा नहीं की गई थी। ऋण राशि 10 लाख रूपए हैं, प्रतिवादी कहता है कि 5 लाख रूपए बकाया हैं और 5 लाख रूपए नगद अदा कर दिए गए हैं तो प्रतिवादी को 5 लाख रूपए बकाया रकम न्यायालय में जमा करना पड़ेगा। बकाया 5 लाख के लिए ऋणी व्यक्ति मुकदमा लड़ सकता हैं, प्रतिवादी को आंशिक नगद अदायगी प्रमाणित करना पड़ेगा। न्यायालय में आदेश 37 सिविल प्रक्रिया संहिता का मामला पेश करते समय अन्य सिविल मामलों की तरह ही दस्तावेज पेश किए जाते है। विचारण की प्रक्रिया संक्षिप्त होती हैं। यदि मामला आदेश 37 सिविल प्रक्रिया संहिता में चलने लायक नहीं हैं तो मामला साधारण सिविल मामलों की तरह चलता है।

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